शनिवार, 24 जनवरी 2009

गरीब और इक्कीसवी शताब्दी

फूंक दो जला दो
उन लाखों झोपडियों को
जिनमे आज भी
दो वक्त का खाना नहीं बनता
जिनमे रखा
कच्ची मिटटी का चूल्हा
स्वयम को दो वक्त जलाने हेतु
आंसुओं से है रोता ,
उलटा पडा तवा
अपना अपमान देखकर
बार -बार आत्महत्या जैसा
घिनोना कार्यं करने हेतु
प्रेरित है होता ,
जहाँ साग की हांडी
बरसों से पड़ी उलटी
सिल बत्तों को कोस रही है
और सिल को सौतन मान
मन ही मन सौतन डाह से
रोग ग्रसित हो रही है ,
चमचे की हालत
एक कोने में
निश्चल पड़े
बरसों से पोलियो के
मरीज जैसी हो गयी है ,
और वहीँ चौके में बैठी
झोपडी की मालकिन
अभाव ग्रस्त होकर
अपनी फूटी किस्मत को
कोस रही है
इतना सब होते हुए भी
हमारी सरकार
२१वि सदी में पहुचने पर
खुशी से पागल हो रही है

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