एक मानव
चूल्हे के समीप
उख्डू बैठ
कुछ - कुछ गर्म राख से
ठंडे पड़े शरीर में
तापस भर रहा
अग्नि जला नहीं सकता
क्यों की
अनाज से महँगी हैं
छोटी छोटी लकडियाँ ,
हाथ पर सूखी रोटियाँ
छोटी सी गुड की डली
या कुछ पीसी मिर्चियाँ
सर्दी की सी सी
चटनी की सी सी
कानों में बजतीं
धीरे धीरे सीटियाँ ,
उदार की अग्नि शांत
चूल्हे की अग्नि शांत
सी सी की आवाज शांत
कष्टों से अनभिग्य
निद्रा की तैयारियां ,
सोहड़ के नाम पर
पुराने फटे गिलाफ में
थोडा सा रोहद
पिल्लै से लटक रहे
सिकुड़ती सी ग्रंथियां ,
एक पिल्ला अगल
एक पिल्ला बगल
अंगों को बार -बार
ढांपने की कोशिश
सारे प्रयत्न
हो गए विफल ,
ऊषा आई भोर हुई
सूरज चमका ताप हुई
अद्धा बंधा
चादर तानी
धुप सेंकी
कुछ चैन भेई
शुक्रवार, 23 जनवरी 2009
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