मैं गरीब मरुँ सर्दी में
बरसातों में और गर्मी में
तूफानों में भूचालों में
सीलन भरी हुई चालों में
पर तुम्हें सुलाऊं महलों में ,
रिक्शों में हथ्ठेलों में
गाड़ियों में हल बैलों में
खंडहरों में खंडा लों में
गन्दी नाली व नालों में
पर तुम्हे सुलाऊं महलों में ,
भामता रहता हूँ मेलों में
खुशियाँ देता हूँ जेलों में
मैं फिरूँ बांटता भोजन
बसों में और रेलों में
पर तुम्हें सुलाऊं महलों में ,
मांजू बर्तन स्टालों में
रखवाली करूँ टकसालों में
उठाता लीद घुड़ सालों में
पर मान ना पाया कालों में
पर तुम्हें सुलाऊं महलों में ,
चलता रहता पग छालों में
बदती दाढी बिखरे बालों में
फटे कपड़े और दुशालों में
भूखे पेट के ख्यालों में
पर तुम्हें सुलाऊं महलों में ,
मैं गरीब भारत का निराला
मत पहिनाओ पुष्पों की माला
पर ना पिलाओ अपमान का प्याला
पुचकारो और काम कराओ
जाकर सो जाओ महलों में
रविवार, 25 जनवरी 2009
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