गरीबी को
जिसने भोगा है
समीपता पाई है
ना जाने कितने क्षण
कितने दिन
कितनी रातें
उसके मनहूस आँचल में
मुख छिपाकर
भूखे पेट सो स्वयं
और स्वयं के बच्चों को
आंसुओं का
नमकीन जहर पिलाकर
सांत्वना दिलाई है ,
इधर उधर से बटोरकर
ना जाने कितने
चूल्हे झाँककर
असंख्य कटु बचन सुन
अपनी और
अपने परिवार की
भूख की अग्नि
शांत कराइ कई ,
क्या वो उसका
वीभत्स प्रितिबिम्ब भी
देखने हेतु
लालायित होगा
शायद नहीं
हाँ वो उसे देखकर
किसी भी
वस्त्र के पल्लू से
घूँघट अवश्य कर लेगा ,
यदि भविष्य में
उसे निर्वस्त्र करने का
प्रयत्न भी करेगी
तो वो अद्भुत साहस से
आगे बढ़कर
उसका वीभत्स
भयावह मुख
अवश्य नोंच लेगा
बुधवार, 28 जनवरी 2009
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1 टिप्पणियाँ:
garebe को bahoot नजदीक से bayaan करती है यह कविता
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