बुधवार, 28 जनवरी 2009

गरीबी अभिशाप है

गरीबी को
जिसने भोगा है
समीपता पाई है
ना जाने कितने क्षण
कितने दिन
कितनी रातें
उसके मनहूस आँचल में
मुख छिपाकर
भूखे पेट सो स्वयं
और स्वयं के बच्चों को
आंसुओं का
नमकीन जहर पिलाकर
सांत्वना दिलाई है ,
इधर उधर से बटोरकर
ना जाने कितने
चूल्हे झाँककर
असंख्य कटु बचन सुन
अपनी और
अपने परिवार की
भूख की अग्नि
शांत कराइ कई ,
क्या वो उसका
वीभत्स प्रितिबिम्ब भी
देखने हेतु
लालायित होगा
शायद नहीं
हाँ वो उसे देखकर
किसी भी
वस्त्र के पल्लू से
घूँघट अवश्य कर लेगा ,
यदि भविष्य में
उसे निर्वस्त्र करने का
प्रयत्न भी करेगी
तो वो अद्भुत साहस से
आगे बढ़कर
उसका वीभत्स
भयावह मुख
अवश्य नोंच लेगा

1 टिप्पणियाँ:

दिगम्बर नासवा ने कहा…

garebe को bahoot नजदीक से bayaan करती है यह कविता