बुधवार, 11 फरवरी 2009

खवाब (स्वप्न )

खवाबों में भी
मिलता है सकून
मुझे आज भी
उस पुराने खंडहरनुमा दडबे में
जिसमे कभी मैं
फक्र से
गुस्ताखियाँ कर
जन्नत से भी उम्दा
मज़ा फरमाया करता था ,
यार दोस्तों के साथ
शैखियाँ बघारकर
यतीमों जैसी जिन्दगी को भी
खुदा का शुक्रिया अदा कर
हसींन बताया करता था ,
महफूज था मैं ख़ुद
और मेरा कुनबा
नीम के दरख्त के नीचे
पाँव पसारकर
बकलम ख़ुद
ख़त लिखकर
अल्लाह तालाह से
खातो किताबत करने का वक्त
बजा फरमाया करता था ,
अल्लाह तालाह ने
मेरे हर लब्ज को
नुक्ता मान
मुझे फकीर जान
अपना हुक्मनामा भिजवाया था
ऐ खुदा के नेक बन्दे
तू कभी जुल्म सितम ना करना
मेरे वास्ते हर शख्स से
केवल मुहब्बत करना

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