कवि केवल
कवि ही नहीं
बल्कि सम्पूर्ण काव्य होता है
और काव्य पूर्ण करते -करते
वो कांव -कांव
करने लगता है ,
श्रोता उसकी आवाज सुनते ही
बिदक जाते हैं
खिसक जाते हैं
दंत पंक्ति निपोर
मुख बिचकाते हैं ,
किंतु जब कवि
अपने काव्य की
अनमोल पंक्तियों को
किसी कवि सम्मलेन में
देश की एकता
अखण्डता या
किसी नारी के
सौन्दर्य का वर्णन कर
मन्त्र मुग्ध करता है
तो श्रोताओं की
शोरमचाती तालिओं से
उसी बेचारे कवि का
स्वागत होता है
सोमवार, 16 फरवरी 2009
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