बृहस्पतिवार, 4 फरवरी 2010

मेरा और मेरे अपनों का दर्द

अपनों के दिए दर्दों से पीड़ित
कराह रहा हूँ ,
पग पग पर दुखों का अम्बार
फिर भी चले जा रहा हूँ ,
नहीं जानता मंजिल मिलेगी या नहीं
रास्ते पे फिर भी चले जा रहा हूँ ,
निवाला देखकर उलटी आती है
जीने के लिए फिर भी खा रहा हूँ ,
आंसू बहकर तालाब ना बना दें
साथ साथ उनको पिए जा रहा हूँ ,
फेफड़ों में गलाव शुरू हो गया है
दवा दारू भी करा रहा हूँ ,
ना जाने कब मौत आगोस में ले ले
उसके गीत भी गाये जा रहा हूँ ,
अपनों से फिर भी शिकवा नहीं है
दुआएं उनको दिए जा रहा हूँ ,
मुझे मुआफ करना मेरे अपनों
दुःख तुम्हारे लेकर सुख दिए जा रहा हूँ .










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