शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

क्योँ हम अपनी जिंदगी को
नेस्तानाबूद करने में लगे हैं
जिंदगी भर हाथ धोकर बस
 पैसों के पीछे पड़े रहते हैं ।
बिना सोचे समझे हम क्यो
किसी से भी दोस्ती कर लेते हैं
और फिर धोखा खा लेने के बाद
समझने का प्रयास करने लगते हैं ,
पर तब तक कुछ बच नहीं पाता
क्योँकि पंछी सब दाना चुग लेते हैं
फिर पछताकर मनोभावों को
 दिल में बसा हाथ मलते रहते हैं ।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

प्रकृति के काल चक्र को बिगाड़ने का दोषी मनुष्य ही है

आज मनुष्य ने पापों की परिणीति को चरम सीमा पर पहुंचा दियाँहै मानो लगता है की संसार का अंत आ चुका है ,जब  ईश्वर ,खुदा ,ईसा संसार के सभी मनुष्य से पूर्णत: नाराज हो जाएगा तो प्रलय आ जायेगी परन्तु अभी कम और कभी कभी थोड़ा सा नाराज होता है तो छोटी छोटी विपदाएँ आ जाती हैं जैसे सुनामी ,बहुत सी बरसात भाड़ ,भूकम्प आदि |
आज मनुष्य अपनें स्वार्थ के लिए प्रकृति स्वरूप असंख्य वृक्षों को काट रहा है ,अनगिनत पशुओं का वध कर या करवा रहा हैं ,ना जाने कितनी भूमि का दोहन कर रहा है ,आकाश में प्रक्षेपास्त्र छोड़ रहा है ,पशु तो छोड़िये पक्षियों तक को नहीं बख्शा जा रहा है ,जमीन को केमिकल्स के जरिये जहरीली बनाई जा रही है ,प्रत्येक देश हथियारों ,गोला बारूद का जखीरा एकत्रित कर रहा है ,जमीन से सभी खनिज निकालकर उसे पोली कर रहा है ,समुन्द्र को भांति भांति प्रकार से प्रदूषित किया जा रहा है ,हवा तक मीलों और फैक्ट्रीज से निकले धुंए से पूर्णत: प्रदूषित हो गई है ,यानी की ये संसार देखा जाए तो मनुष्यों के रहने के प्रयुक्त भी नहीं रहा है ,अब सोचिये ये सब कौन कर रहा है ,और जो ये कर रहा है ,वो ही दोषी है तो दंड का भागी भी तो वाही होगा ,इसलिए आज नहीं तो कल हम सभी को परिणाम भुगतना तो पडेगा ही |

गुरुवार, 4 मार्च 2010

जैसे बौराया आम्र तरु
वैसे ही बौराऊँ मैं
जितने फलौं से लदे तरु
उतने ब्लोगर्स से मिल जाऊं मैं ,

सोमवार, 1 मार्च 2010

होली की सुभ कामनाएं

मैं के ,पी, चौहान आप सभी ब्लोगर्स को होली मैया की बहुत बहुत सारी शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ और होली माई से प्रार्थना करता हूँ की वो सभी तरह से भविष्य में सहायता करें और आप सभी को उच्च पद प्रदान करें

जय होलिका माई ,जय ब्लोगर्स भाई

रविवार, 15 मार्च 2009

धुम्रपान दंडिका और कवि

धुम्रपान दंडिका के
अधजले ठोंटके
बिस्तर के नीचे से
या एस्ट्रे की राख से
ढूंड-ढूंड कर
कब तक सुल्गाओगे ,
स्वयम के हौंठ
अंगुलियाँ
अपना बिस्तर
यहाँ तक कि
अपना ह्रदय भी
धीरे -धीरे जलाते जाओगे ,
और मुझे विश्वास है
कि जिस दिन
अधजले ठोंटके भी ना मिलेंगे
तो पक्के कवि बन जाओगे ,
और तब
तिहारी कविताओं में
विरह होगा
संयोग होगा
सौन्दर्य होगा
वात्सल्य होगा
आसक्ति होगी
हास्य होगा
वैमनस्य होगा
प्रेम होगा
विरोध होगा
आदि होगा अंत होगा
पर अधजले
धुम्रपान दंडिका के
टुकडों का
कहीं भी
नामोनिशान ना होगा ,

कविवर नागार्जुन के निधन के बाद


मत खोजो
तुम मुझको
मैं अब भी
छिपा हुआ हूँ
शब्दों में ,
पुस्तकें
खोलकर देखो मेरी ,
पाऊँगा
उनके अंत;स्थल में ,
मरा नहीं
मैं लीनं हुआ हूँ
आत्मा के
सुंदर आँचल में ,
तन दग्ध हुआ
आवश्यक था
शब्द नहीं बचे थे
मेरी श्वान्सौं में

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

लेखनी

लेखनी जब चलती है
लिखती चली जाती है
अपने ओष्ठ भींचकर
बोलती चली जाती है
जितना अम्रत भरा है
उसके उदर में
शब्द -शब्द कर
उंडेलती चली जाती है
बना देती है कविता
या बहा देती है सरिता
रक्त से ओष्ठ रंग
जगा देती है अस्मिता

मेरी कविता

आगंतुक को
फाटक पर देखा
झट से गुहार लगाई
मुंह ना खोल सका बेचारा
मैंने एक कविता उसे सुनाई
और फ़िर पूछा
कहाँ से आए
कहाँ है जाना
कौन गाँव है
कौन ठिकाना
यहाँ पर ना कोई तेरा
ना कोई मेरा
जीवन तो है रैन बसेरा
जैसे ही बोलने हेतु
उसने ली हिच्काई
मौका पाकर
मैंने एक दम
एक कविता और सुनाई
मेरा मूड देख बेचारा
होने लगा वो
नो दो ग्यारह
जैसे ही कुछ दूर गया
मैंने आवाज लगाई
दो से यहाँ कुछ ना होता
तीन तो करता जाता भाई
पीछे मुड़कर
देखा ना उसने
सड़क पर दौड़ लगाई
ठोकर खाकर गिरा
सड़क पर
सिर के बल
पलती खाई
होश आया तो मुझे देखकर
उलटी उसको आई

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

प्यार के बदले दुत्कार,क्या कहें व्यवहार या संस्कार (पार्ट २)

इसी प्रकार समय बीतता रहा और मैं फरवरी १९८७ में ग्रह प्रवेश कर गया क्योंकि मकान का निर्माण पूरा हो चुका था और हम किराए के मकान बी -३२८ में रहते थे ,परन्तु बीच वाला और छोटे वाला ,और माताजी कोई भी मकान में नही आ रहा था ,मैं इन सबको जबरदस्ती इस मकान में उठाकर लाया की अगर मैं अकेला ही मकान में रहूंगा तो समाज क्या कहेगा की इतनी बड़ी कोठी में अकेला रह रहा है और भाई और माँ किराए के मकान में रह रहे हैं ,और दुसरा ख़तरा ये भी था की अगर मैं इन सबको अपने मकान में नहीं लाता तो बीच वाला बी--३२८ को ही खाली ना करता और वोहरा साहबबड़े को गालियाँ देते क्योंकि मकान तो उसी ने किराए पर ही लिया था इसी तरह मौज मस्ती में समय बीतता जा रहा था पूरा परिवार एक ही रसोई में पका खाना खा रहा था अचानक बड़े को व्यापार में १५--२०-लाख का नुक्सान हो गया तो उसने दोनों से अपना दिया पैसा ही माँगा तो वो लोग बिफर गये और पैसा देने से भी इनकार कर दिया और बजाय साथ देने के अपने -अपने बर्तन भांडे उठाकर रातों रात अपने अपने कमरे में सिमित हो गए और बोलचाल भी बंद कर दी ,बड़े को इन दोनों ने नाही तो पैसा दिया और नाही हिसाब तक किया तो बड़े ने सदर की दूकान बेचीं और जो पैसा पास था व्यापारियों को साड़ी देनदारी दे दी और अपनी गुड विल पर आंच ना आने दी और सबका हिसाब साफ़ कर नए तरीके से व्यापार शुरू कर दिया ,पर पूरी फॅमिली से दिल खट्टा हो गया और किसी प्रकार सन १९९३ आ गया तोइनसे हिस्साब मांगा तो दोनों ने हाथ खड़े कर दिए ,
अब हमारे रिश्तों में इतनी दरार पड़ चुकी थी की ,एक साथ रहना दुश्वार था ,अत; मैंने इन सबसे अलग होना चाहा वैसे भी ये लोग अब अनैतिक कार्यौं में संलग्न होने लगे थे जैसे की किसी की जगह किसी का मकान घेर लेना ,उसी समय में इन्होने जे-६४ ग्रेटर कैलाश ,जे .पि .शर्मा जी के साथ मिलकर एक ओरत का मकान घेर लिया तो इन से और दिल खट्टा हो गया की ये तो बनी बनाई इज्जत खाक में मिलाने जा रहे हैं इनको समझाया भी परन्तु इन पर कोई असर नही हुआ ,अत; एक हम चार व्यक्ति बैठे और आपस में हिसाब किताब कर लिया ,जो भी प्रेम ने प्रेम से माँगा वो सभी उसको अशोक चुघ और जे .पी .शर्मा जी के समक्ष दे दिया गया और मेरे पास बच्चाकेवल एक मकान बी ३२२ और लगभग १० लाख का कर्जा ,और प्रेम को लगभग ४० लाख का समान जिसमे एक दारु का लाइसेंस ,एक फैक्ट्री .और लगभग १० लाख नकद ,और भी लाखों का सामान था जो की मैं लिखना मुनासिब नहीं समझता ,इसके बदले में हमने कुछ कागज़ प्रेम से करवा लिए ,और एक कागज़ इसने हाथ से भी लिख कर दिया जो की भावनाओं में बहकर मैंने फाड़ दिया जिसका खामियाजा आज भी मैं भर रहा हूँ ,काश मैंने वो पर्चा ना फाडा होता तो आज मुझे कोर्ट कछेरी के चक्कर ना लगाने पड़ते ,पर होनी को कोण ताल सकता है ,छोटा वाला तो पहले ही ४ लाख ले जा चुका था ,उसने तो बाद में और डिमांड नहीं की ,
उसके बाद तो हम तीनो के सम्बन्ध बिल्कुल ही ख़राब हो गए ,प्रेम की तरफ़ से धमकियां भी आने लगी ,और ये मकान खाली करके जाने का नाम ही नहीं लेता था मैं जब भी इसको मकान खाली करने को कहता तो कभी धमकी ,कभी मार पिटाई के लिए तत्पर ,,इसी प्रकार सन २००१ भी आ गया फ़िर इससे मकान खाली करने को कहा तो इसने उलटा घर में राखी एक प्लास्टिक की मशीन चोरी करके पिछले दरवाजे से कबादिये को बेच दी जब की हम लोग उस दिन धर्मशाला में राजपूत सभा का फंक्शन था उसमे मशगूल थे इसने मौके का फायदा उठाकर ये सब काण्ड कर दिया ,हमने उसकी रिपोर्ट लोक्विहार चोकी में लिखवाई परन्तु इसकी वहाँ अच्छी रसूख होने के कारण ऍफ़ .आई आर .तो क्या उलटा चोकी वाले ने आपसी लड़ाई झगडा ,प्रापर्टी विवाद करके ,ऍफ़ .आई .आर दर्ज करा दी क्योंकि अब तक प्रेम ,प्रेम ना रहकर प्राप्ति डीलर ,बल्कि एक क्रिमिनल बन चुका था पर मैं इस सबसे अनभिग्य था ये सब तो मुझेअब आकर पता चला की ये कितना बड़ा फ्रौड़ बन चुका है ,इसने और भी कितने ही लोगों को अपने चंगुल में फंसा रखा है ,मई यहाँ उनके नाम तो नहीं लिखूंगा परन्तु समय आने पर सबकी परत खोल दूंगा अब तो मैंने सबूत भी एकत्रित कर लिए हैं