शनिवार, 17 सितंबर 2016

सौतेला ना होने  के बावजूद
सौतेला बना  दिया
ना माँ का वातसल्य मिला
ना पिता श्री ने दुलार किया ,

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

क्योँ हम अपनी जिंदगी को
नेस्तानाबूद करने में लगे हैं
जिंदगी भर हाथ धोकर बस
 पैसों के पीछे पड़े रहते हैं ।
बिना सोचे समझे हम क्यो
किसी से भी दोस्ती कर लेते हैं
और फिर धोखा खा लेने के बाद
समझने का प्रयास करने लगते हैं ,
पर तब तक कुछ बच नहीं पाता
क्योँकि पंछी सब दाना चुग लेते हैं
फिर पछताकर मनोभावों को
 दिल में बसा हाथ मलते रहते हैं ।

सोमवार, 8 सितंबर 2014

प्रकृति के काल चक्र को बिगाड़ने का दोषी मनुष्य ही है

आज मनुष्य ने पापों की परिणीति को चरम सीमा पर पहुंचा दियाँहै मानो लगता है की संसार का अंत आ चुका है ,जब  ईश्वर ,खुदा ,ईसा संसार के सभी मनुष्य से पूर्णत: नाराज हो जाएगा तो प्रलय आ जायेगी परन्तु अभी कम और कभी कभी थोड़ा सा नाराज होता है तो छोटी छोटी विपदाएँ आ जाती हैं जैसे सुनामी ,बहुत सी बरसात भाड़ ,भूकम्प आदि |
आज मनुष्य अपनें स्वार्थ के लिए प्रकृति स्वरूप असंख्य वृक्षों को काट रहा है ,अनगिनत पशुओं का वध कर या करवा रहा हैं ,ना जाने कितनी भूमि का दोहन कर रहा है ,आकाश में प्रक्षेपास्त्र छोड़ रहा है ,पशु तो छोड़िये पक्षियों तक को नहीं बख्शा जा रहा है ,जमीन को केमिकल्स के जरिये जहरीली बनाई जा रही है ,प्रत्येक देश हथियारों ,गोला बारूद का जखीरा एकत्रित कर रहा है ,जमीन से सभी खनिज निकालकर उसे पोली कर रहा है ,समुन्द्र को भांति भांति प्रकार से प्रदूषित किया जा रहा है ,हवा तक मीलों और फैक्ट्रीज से निकले धुंए से पूर्णत: प्रदूषित हो गई है ,यानी की ये संसार देखा जाए तो मनुष्यों के रहने के प्रयुक्त भी नहीं रहा है ,अब सोचिये ये सब कौन कर रहा है ,और जो ये कर रहा है ,वो ही दोषी है तो दंड का भागी भी तो वाही होगा ,इसलिए आज नहीं तो कल हम सभी को परिणाम भुगतना तो पडेगा ही |

गुरुवार, 4 मार्च 2010

जैसे बौराया आम्र तरु
वैसे ही बौराऊँ मैं
जितने फलौं से लदे तरु
उतने ब्लोगर्स से मिल जाऊं मैं ,

सोमवार, 1 मार्च 2010

होली की सुभ कामनाएं

मैं के ,पी, चौहान आप सभी ब्लोगर्स को होली मैया की बहुत बहुत सारी शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ और होली माई से प्रार्थना करता हूँ की वो सभी तरह से भविष्य में सहायता करें और आप सभी को उच्च पद प्रदान करें

जय होलिका माई ,जय ब्लोगर्स भाई

रविवार, 15 मार्च 2009

धुम्रपान दंडिका और कवि

धुम्रपान दंडिका के
अधजले ठोंटके
बिस्तर के नीचे से
या एस्ट्रे की राख से
ढूंड-ढूंड कर
कब तक सुल्गाओगे ,
स्वयम के हौंठ
अंगुलियाँ
अपना बिस्तर
यहाँ तक कि
अपना ह्रदय भी
धीरे -धीरे जलाते जाओगे ,
और मुझे विश्वास है
कि जिस दिन
अधजले ठोंटके भी ना मिलेंगे
तो पक्के कवि बन जाओगे ,
और तब
तिहारी कविताओं में
विरह होगा
संयोग होगा
सौन्दर्य होगा
वात्सल्य होगा
आसक्ति होगी
हास्य होगा
वैमनस्य होगा
प्रेम होगा
विरोध होगा
आदि होगा अंत होगा
पर अधजले
धुम्रपान दंडिका के
टुकडों का
कहीं भी
नामोनिशान ना होगा ,

कविवर नागार्जुन के निधन के बाद


मत खोजो
तुम मुझको
मैं अब भी
छिपा हुआ हूँ
शब्दों में ,
पुस्तकें
खोलकर देखो मेरी ,
पाऊँगा
उनके अंत;स्थल में ,
मरा नहीं
मैं लीनं हुआ हूँ
आत्मा के
सुंदर आँचल में ,
तन दग्ध हुआ
आवश्यक था
शब्द नहीं बचे थे
मेरी श्वान्सौं में

सोमवार, 16 फ़रवरी 2009

लेखनी

लेखनी जब चलती है
लिखती चली जाती है
अपने ओष्ठ भींचकर
बोलती चली जाती है
जितना अम्रत भरा है
उसके उदर में
शब्द -शब्द कर
उंडेलती चली जाती है
बना देती है कविता
या बहा देती है सरिता
रक्त से ओष्ठ रंग
जगा देती है अस्मिता

मेरी कविता

आगंतुक को
फाटक पर देखा
झट से गुहार लगाई
मुंह ना खोल सका बेचारा
मैंने एक कविता उसे सुनाई
और फ़िर पूछा
कहाँ से आए
कहाँ है जाना
कौन गाँव है
कौन ठिकाना
यहाँ पर ना कोई तेरा
ना कोई मेरा
जीवन तो है रैन बसेरा
जैसे ही बोलने हेतु
उसने ली हिच्काई
मौका पाकर
मैंने एक दम
एक कविता और सुनाई
मेरा मूड देख बेचारा
होने लगा वो
नो दो ग्यारह
जैसे ही कुछ दूर गया
मैंने आवाज लगाई
दो से यहाँ कुछ ना होता
तीन तो करता जाता भाई
पीछे मुड़कर
देखा ना उसने
सड़क पर दौड़ लगाई
ठोकर खाकर गिरा
सड़क पर
सिर के बल
पलती खाई
होश आया तो मुझे देखकर
उलटी उसको आई